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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक पुलिस कांस्टेबल की अनिवार्य सेवानिवृत्ति को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि बर्खास्तगी को अंतिम उपाय के रूप में ही अपनाया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को दंड निर्धारित करने से पहले विनियमन 226 के तहत कम दंड के विकल्पों पर विचार करना चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
रामसागर सिन्हा, जो बिलासपुर के सकरी में कांस्टेबल के रूप में तैनात थे, को 31 अगस्त 2017 को अनुशासनात्मक अधिकारी ने आरोप पत्र जारी किया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने महत्वपूर्ण सुरक्षा ड्यूटी करने से इनकार कर दिया और वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों की अवहेलना की। यह आरोप छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल अधिनियम 1968 की धारा 16 और 17 तथा पुलिस विनियमन संख्या 64 के उल्लंघन के अंतर्गत आता था। विभागीय जांच के बाद सिन्हा को अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा दी गई, जिसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
डिवीजन बेंच ने माना – पहले चेतावनी दी जानी थी
सिन्हा के वकील ने तर्क दिया कि वे 56 वर्ष की आयु में खराब स्वास्थ्य के बावजूद कट्टर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में तैनात थे और शारीरिक अस्वस्थता के कारण 24 जुलाई 2017 को ड्यूटी पर उपस्थित नहीं हो सके। लेकिन जांच समिति ने उनके स्वास्थ्य की पुष्टि के लिए मेडिकल जांच नहीं करवाई।
अदालत ने यह पाया कि कांस्टेबल ने किसी वरिष्ठ अधिकारी से दुर्व्यवहार नहीं किया था, बल्कि अपनी अस्वस्थता का हवाला दिया था। कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल अधिनियम 1968 की धारा 17 को लागू करना अनुचित था, और पुलिस विनियमन 226 के तहत पहले चेतावनी दी जानी चाहिए थी।
अनुशासनात्मक कार्रवाई के प्रावधानों पर विचार आवश्यक

डिवीजन बेंच ने इस फैसले में जोर दिया कि विनियमन 64 के तहत पुलिस में अनुशासन और आदेशों का पालन जरूरी है, लेकिन विनियमन 226 विशेष रूप से कांस्टेबलों के लिए दंड की प्रक्रिया निर्धारित करता है। सेवा से हटाने का आदेश देने से पहले अनुशासनात्मक और अपीलीय अधिकारियों को इन प्रावधानों पर विचार करना आवश्यक है।
कोर्ट ने इस आधार पर कांस्टेबल की अपील स्वीकार कर ली और सिंगल बेंच के आदेश को रद्द कर दिया।
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